यशोदा मैया धीरे-धीरे शान्त पूजा कक्ष में प्रवेश करती हैं, जहाँ 🪔🪔दीपकों की कोमल रोशनी चारों ओर फैली हुई है। उनकी नजर तुरन्त पूजा स्थान के पास खड़े नन्द बाबा पर पड़ती है, जो बहुत चिन्तित और परेशान दिखाई दे रहे हैं। नन्द बाबा बार-बार इधर-उधर देख रहे हैं, मानो उनकी कोई बहुत अनमोल वस्तु खो गई हो।
यशोदा मैया को देखते ही नन्द बाबा घबराकर बताते हैं कि शालिग्राम भगवान पूजा स्थान से कहीं गायब हो गए हैं। वे उस खाली स्थान की ओर इशारा करते हैं, जहाँ कुछ समय पहले तक शालिग्राम भगवान विराजमान थे। नन्द बाबा समझ नहीं पा रहे कि भगवान अचानक वहाँ से कैसे गायब हो गए।🤔💭
यशोदा मैया शान्त भाव से पूजा कक्ष में चारों ओर देखने लगती हैं, जबकि नन्द बाबा बेचैनी से खोजते रहते हैं। वह पूजा की थाली, फूलों और पूजा स्थान के आसपास ध्यान से देखती हैं। नन्द बाबा की घबराहट के विपरीत, यशोदा मैया के चेहरे पर हल्की जिज्ञासा और शान्ति दिखाई देती है।
नन्द बाबा के ठीक पीछे छोटे कान्हा चुपके से छिपे हुए हैं और पूरी कोशिश कर रहे हैं कि कोई उन्हें देख न पाए। वह एकदम शान्त खड़े हैं, लेकिन उनके गोल-मटोल गाल असामान्य रूप से फूले हुए हैं। उनकी बड़ी-बड़ी मासूम आँखें ऐसा भाव बना रही हैं, मानो उन्होंने कुछ किया ही न हो.
चारों ओर देखते हुए अचानक यशोदा मैया की नजर नन्द बाबा के पीछे छिपे कान्हा पर पड़ती है। उनका ध्यान तुरन्त कान्हा के फूले हुए गालों और कसकर बन्द किए हुए होंठों पर जाता है। यशोदा मैया के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती है और वह समझ जाती हैं कि शालिग्राम भगवान कहाँ गए हैं।
यशोदा मैया बिना कुछ बताए धीरे से नन्द बाबा के पास जाती हैं। वह उनके पीछे हाथ बढ़ाकर प्यार से छोटे कान्हा का हाथ पकड़ लेती हैं। कान्हा मासूमियत से यशोदा मैया की ओर देखते हैं और वह उन्हें धीरे-धीरे नन्द बाबा के पीछे से बाहर ले आती हैं।
अब कान्हा यशोदा मैया और नन्द बाबा के बीच मासूम बनकर खड़े हैं। उनके गोल-मटोल गाल अभी भी फूले हुए हैं और उन्होंने अपने होंठ कसकर बन्द किए हुए हैं। नन्द बाबा उलझन में कान्हा को देखते हैं, लेकिन अभी तक उनकी छोटी सी शरारत को पूरी तरह समझ नहीं पाते।
यशोदा मैया मुस्कुराती हैं और प्यार से कान्हा के फूले हुए मुख की ओर इशारा करती हैं। वह नन्द बाबा की ओर देखकर हल्के शरारती अंदाज में कहती हैं, “ये रहे आपके शालिग्राम भगवान।” कान्हा बिल्कुल चुप रहते हैं और उनका मासूम चेहरा इस दृश्य को और भी प्यारा बना देता है।
नन्द बाबा ध्यान से कान्हा के फूले हुए गालों को देखते हैं और अचानक पूरी बात समझ जाते हैं। उनकी आँखें आश्चर्य से बड़ी हो जाती हैं, क्योंकि उन्हें एहसास होता है कि कान्हा ने शालिग्राम भगवान को अपने मुख में रख लिया है। अब नन्द बाबा के चेहरे की उलझन चिन्ता में बदल जाती है।
नन्द बाबा तुरन्त झुककर कान्हा के सामने बैठ जाते हैं, ताकि वह उनकी आँखों में देख सकें। बहुत प्यार और चिन्ता के साथ वह धीरे से पुकारते हैं, “कन्हैया...” फिर वह बड़े प्रेम से कहते हैं, “कन्हैया, अपना मुँह खोल दो।”
कान्हा शरारती आँखों से नन्द बाबा की ओर देखते हैं, लेकिन अपना मुँह नहीं खोलते। वह अपना छोटा सा चेहरा थोड़ा दूसरी ओर कर लेते हैं और होंठ कसकर बन्द रखते हैं। उनके चेहरे के भाव ऐसे हैं, मानो उन्हें नन्द बाबा का इस तरह मनाना बहुत अच्छा लग रहा हो।
नन्द बाबा प्यार से कान्हा के कोमल गालों को सहलाते हैं और उन्हें फिर से मनाने की कोशिश करते हैं। वह बार-बार प्रेम से “कन्हैया” कहकर पुकारते हैं और उनसे मुँह खोलने का आग्रह करते हैं। लेकिन कान्हा फूले हुए गालों के साथ चुपचाप खड़े रहते हैं।
यशोदा मैया पास बैठकर पिता और पुत्र के इस प्यारे दृश्य को मुस्कुराते हुए देखती हैं। नन्द बाबा लगातार कान्हा को प्यार से पुचकारते हैं, लेकिन कान्हा फिर भी अपना मुँह खोलने को तैयार नहीं होते। उनकी शरारती आँखों से साफ दिखाई देता है कि वह सब कुछ समझ रहे हैं।
आखिरकार नन्द बाबा ताजे और मुलायम मक्खन से भरी एक छोटी सी कटोरी कान्हा के सामने लाते हैं। वह प्यार से कन्हैया को उनके प्रिय मक्खन का लालच देते हैं और कहते हैं कि मुँह खोलने पर उन्हें स्वादिष्ट मक्खन मिलेगा। कान्हा की नजर तुरन्त मक्खन की कटोरी पर टिक जाती है।
कान्हा पहले मक्खन की ओर देखते हैं और फिर धीरे से नन्द बाबा की ओर नजर उठाते हैं। कुछ पल सोचने का नाटक करने के बाद वह आखिरकार मुँह खोलने के लिए मान जाते हैं। नन्द बाबा राहत की साँस लेते हुए उनके थोड़ा और पास आ जाते हैं।
छोटे कान्हा धीरे-धीरे अपना छोटा सा मुख खोलना शुरू करते हैं और नन्द बाबा भीतर देखने के लिए आगे झुकते हैं। नन्द बाबा को लगता है कि उन्हें केवल शालिग्राम भगवान दिखाई देंगे। लेकिन कान्हा के मुख के भीतर अचानक एक रहस्यमय दिव्य प्रकाश चमकने लगता है।
कान्हा का छोटा सा मुख अचानक एक अनन्त दिव्य आकाश में बदलता हुआ दिखाई देता है। नन्द बाबा उसके भीतर असंख्य चमकते तारे और दिव्य प्रकाश से भरा अथाह आकाश देखते हैं। वह आश्चर्य में वहीं स्थिर रह जाते हैं और समझ नहीं पाते कि उनकी आँखों के सामने क्या हो रहा है।
वह दिव्य दृश्य और भी विशाल होने लगता है और नन्द बाबा अनगिनत ग्रहों को अन्तरिक्ष में घूमते हुए देखते हैं। उन्हें चमकते चन्द्रमा, अनेक सूर्य, नक्षत्र और विशाल आकाशगंगाएँ दिखाई देती हैं। ऐसा लगता है मानो पूरा ब्रह्माण्ड उनकी आँखों के सामने जीवित होकर गति कर रहा हो।
एक ब्रह्माण्ड के आगे नन्द बाबा को अनेक और ब्रह्माण्ड दिखाई देने लगते हैं, जो एक के बाद एक प्रकट हो रहे हैं। हर ब्रह्माण्ड के भीतर अपने तारे, ग्रह, लोक और रहस्यमय संसार दिखाई देते हैं। यह अनन्त सृष्टि मानव की कल्पना से भी कहीं अधिक विशाल प्रतीत होती है।
अब वह ब्रह्माण्डीय दृश्य बदलता है और नन्द बाबा को आकाश को छूते विशाल पर्वत दिखाई देते हैं। उनके नीचे हरी-भरी घाटियाँ, घने वन और शान्त धरती फैली हुई है। दिव्य प्रकाश में चमकती नदियाँ धरती के बीच से सुन्दरता के साथ बहती दिखाई देती हैं।
नन्द बाबा विशाल समुद्रों को दूर क्षितिज तक फैला हुआ देखते हैं। पर्वतों से बड़े-बड़े झरने गिर रहे हैं, आकाश में बादल चल रहे हैं और सृष्टि में हवाएँ बह रही हैं। प्रकृति का हर रूप छोटे से कान्हा के मुख के भीतर एक साथ दिखाई दे रहा है।
उस अद्भुत दृश्य में सूर्य उदय होता है और फिर अस्त होता दिखाई देता है, जबकि चन्द्रमा शान्त आकाश में अपनी यात्रा करता है। नन्द बाबा दिन को रात में और रात को फिर दिन में बदलते हुए देखते हैं। ऐसा लगता है मानो समय स्वयं उस अनन्त ब्रह्माण्ड के भीतर उनकी आँखों के सामने बह रहा हो।
नन्द बाबा अनेक लोक देखते हैं, जहाँ जीवन, प्रकृति और असंख्य जीव मौजूद हैं। सृष्टि की रचना, उसका अस्तित्व और ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण गति एक साथ उनके सामने प्रकट होती है। नन्द बाबा आश्चर्य से भर जाते हैं कि यह सब कुछ उनके छोटे से कन्हैया के मुख के भीतर समाया हुआ है।
नन्द बाबा के सामने भगवान श्रीकृष्ण का अद्भुत और अकल्पनीय विराट रूप प्रकट होता है। उस अनन्त दिव्य स्वरूप में शिव, रुद्र, विष्णु, अग्नि तथा सृष्टि की रचना और संहार करने वाली अनेक दिव्य शक्तियाँ दिखाई देती हैं। असंख्य तारे, ग्रह, आकाशगंगाएँ, लोक और सम्पूर्ण जीव-जगत उसी विराट स्वरूप में समाए हुए हैं। एक ओर उनके दिव्य रूप से अनगिनत जीव और प्रजातियाँ जन्म लेती दिखाई देती हैं, तो दूसरी ओर सृष्टि के संहार और पुनः निर्माण का अनन्त चक्र चलता दिखाई देता है। नन्द बाबा विस्मय और भक्ति से देखते रह जाते हैं और उन्हें अनुभव होता है कि उनका छोटा सा कन्हैया ही सम्पूर्ण सृष्टि का आदि, पालनकर्ता और संहारकर्ता—स्वयं परमेश्वर है।
भगवान का विराट रूप असीम, प्रकाशमय और मानव की समझ से परे दिखाई देता है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, असंख्य लोक और पूरी सृष्टि उसी दिव्य स्वरूप के भीतर समाई हुई प्रतीत होती है। नन्द बाबा विस्मय, भक्ति और गहरे आश्चर्य के साथ उस विराट रूप को देखते रहते हैं।
कुछ पलों के लिए नन्द बाबा अपने आसपास की सम्पूर्ण सांसारिक दुनिया को भूल जाते हैं। उनके सामने खड़ा छोटा सा कान्हा अब केवल उनका प्यारा कन्हैया नहीं दिखाई देता, बल्कि उन्हें उसमें सम्पूर्ण सृष्टि के परमेश्वर के दर्शन होते हैं। इस दिव्य अनुभव से अभिभूत नन्द बाबा एकदम शान्त और स्तब्ध खड़े रह जाते हैं।
उसी समय भगवती योगमाया एक सूक्ष्म और प्रकाशमय दिव्य रूप में प्रकट होती हैं। वह अपना एक हाथ नन्द बाबा की ओर उठाती हैं और एक कोमल दिव्य ऊर्जा उनके चारों ओर फैलने लगती है। योगमाया का प्रभाव धीरे-धीरे नन्द बाबा के मन को ढक लेता है और उन्हें फिर से कान्हा के प्रति उनके सरल वात्सल्य भाव में लौटाने लगता है।
योगमाया के कोमल प्रभाव से वह भव्य ब्रह्माण्डीय दृश्य धीरे-धीरे लुप्त होने लगता है। विराट रूप, आकाशगंगाएँ, ग्रह, पर्वत, नदियाँ और अनगिनत ब्रह्माण्ड किसी दूर के स्वप्न की तरह ओझल हो जाते हैं। नन्द बाबा उलझन में सोचने लगते हैं कि उन्होंने जो देखा वह सच था या केवल कोई भ्रम।
दिव्य दृश्य पूरी तरह लुप्त हो जाता है और अब नन्द बाबा के सामने फिर से केवल उनका छोटा सा कन्हैया खड़ा दिखाई देता है। कान्हा मासूमियत से अपने मुख से शालिग्राम भगवान को बाहर निकालते हैं और धीरे से नन्द बाबा के खुले हुए हाथों में रख देते हैं। उनके चेहरे पर ऐसी सरल मासूमियत और शान्ति है, मानो अभी कुछ असाधारण हुआ ही न हो।
शालिग्राम भगवान को लौटाने के बाद छोटे कान्हा प्यार से नन्द बाबा की आँखों में देखते हैं और अपनी दोनों नन्ही बाँहें उनकी ओर फैला देते हैं। बहुत ही मीठी और मासूम आवाज में वह पुकारते हैं, “बाबा...” नन्द बाबा अपनी सारी उलझन भूलकर प्रेम से मुस्कुराते हैं और अपने कन्हैया को गोद में उठा लेते हैं, जबकि पास बैठी यशोदा मैया पिता और पुत्र के इस प्यारे दृश्य को प्रेम और आनन्द से निहारती रहती हैं।