मथुरा नगरी आज आनंद और उत्सव से सजी हुई थी। राजमहल से लेकर नगर की गलियों तक विवाह की सुंदर तैयारियाँ चल रही थीं। चारों ओर फूलों की सजावट, मंगल गीत और उत्सव का उल्लास था। पूरा नगर वसुदेव और देवकी के शुभ विवाह की प्रतीक्षा कर रहा था।
वसुदेव यादवों के राजा शूरसेन के पुत्र थे। वे धर्मपरायण, सत्यनिष्ठ और भगवान के परम भक्त थे। देवकी राजा देवक की पुत्री थीं, जो मथुरा के राजा उग्रसेन के छोटे भाई थे। देवकी बहुत दयालु, सरल और कोमल हृदय वाली थीं। दोनों ही प्रतिष्ठित यादव राजवंश से संबंध रखते थे। वैदिक रीतियों के साथ वसुदेव और देवकी का विवाह आनन्दपूर्वक सम्पन्न हुआ।
मथुरा के राजा उग्रसेन का पुत्र कंस शक्तिशाली, चतुर और कठोर स्वभाव का था। सत्ता की लालसा में उसने अपने ही पिता से राजसिंहासन छीन लिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। उसका शासन क्रूर और अत्याचारी था, इसलिए प्रजा उससे भयभीत रहती थी। लेकिन कंस अपनी बहन देवकी से प्रेम करता था। देवकी का विवाह वसुदेव से होने पर वह प्रसन्न था, क्योंकि वसुदेव राजा शूरसेन के पुत्र थे और यादव वंश में उनका बहुत सम्मान था।
विवाह आनन्दपूर्वक सम्पन्न हुआ। विदाई के समय देवकी जी वसुदेव के साथ रथ पर बैठीं। राजपरिवार ने नवविवाहित जोड़े को प्रेम और आशीर्वाद के साथ विदा किया। अपनी प्रिय बहन के प्रति स्नेह दिखाते हुए कंस स्वयं सारथी बना और देवकी तथा वसुदेव को विदा करने चला।
जैसे ही रथ आगे बढ़ा, उसमें वसुदेव और देवकी साथ बैठे थे, और कंस स्वयं सारथी बनकर उसे चला रहा था। मार्ग के दोनों ओर खड़ी भीड़ हर्ष से जयकार करने लगी और नवविवाहित जोड़े पर फूलों की पंखुड़ियाँ बरसाने लगी। उस समय ऐसा लग रहा था मानो पूरा मथुरा इस पावन विवाह के आनन्द में डूब गया हो।
अचानक साफ़ आकाश में तेज बिजली चमकी। उसके साथ ऐसी भयंकर गर्जना गूँजी कि घोड़े सहम गए और रथ की गति धीमी पड़ गई। कुछ क्षण पहले तक फूल बरसाती और जयकार करती भीड़ एकदम शांत हो गई। कंस, वसुदेव, देवकी और वहाँ उपस्थित सभी लोग हैरान और चिन्तित होकर आकाश की ओर देखने लगे।
तभी आकाश में एक बड़ी गर्जना के साथ आकाशवाणी हुई, “ओ मूर्ख कंस! ओ मूर्ख कंस!” आकाश में सुनाई देने वाली ऐसी दिव्य आवाज़, जिसमें बोलने वाला दिखाई न दे, उसे **आकाशवाणी** कहते हैं। यह सुनते ही कंस क्रोध से भर उठा। उसने चारों ओर देखा, अपनी तलवार निकालकर गरजते हुए कहा, **“कौन है जो मुझे इस प्रकार सम्बोधित करने का साहस कर रहा है? लगता है, उसे अपने प्राणों का मोह नहीं है!”**
आकाशवाणी फिर से बोली, **“ओ मूर्ख कंस! जिस देवकी को तू इतने उत्साह और प्रेम से रथ में बिठाकर ले जा रहा है, इसी का आठवाँ पुत्र तेरा वध करेगा!”** यह सुनते ही देवकी, वसुदेव और कंस—तीनों के चेहरों पर भय छा गया।
एक पल की भी देर किए बिना कंस ने अपनी तलवार खींच ली। उसके चेहरे पर छाया भय तुरन्त भयंकर क्रोध में बदल गया। उसने देवकी को बालों से पकड़ लिया और उनका जीवन समाप्त करने के लिए तलवार उठा ली।
यदि उसकी संतान मेरे जीवन को खतरे में डालती है," कंस गरजे, उनकी आँखें भय से जंगली, "तो मैं इस खतरे को अभी समाप्त कर दूँगा, इससे पहले कि इसे बढ़ने का कभी कोई अवसर मिले।" हा हा हा हा हा हा
धर्मात्मा वसुदेव जी ने शान्त भाव से कंस से कहा, “हे कंस! आप वीर हैं और भोजवंश का गौरव हैं। फिर अपनी ही नवविवाहित बहन पर तलवार कैसे उठा सकते हैं? जिसने जन्म लिया है, उसे एक दिन मृत्यु भी अवश्य आएगी।”
वसुदेव, भयभीत होकर, तुरंत आगे बढ़े, उन्होंने आगे कहा, “यदि आपको देवकी के आठवें पुत्र से भय है, तो इसमें देवकी का कोई दोष नहीं है। स्त्री का वध करना पाप है, और अपनी ही बहन का वध करना तो बहुत बड़ा अधर्म होगा।”
देवकी आश्चर्य और गहरे दुःख के साथ कंस को देखती रहीं। उनकी आँखों में आँसू भर आए। उनके मन में बस यही प्रश्न उठ रहा था—क्या यह वही भाई है, जिससे वह इतना प्रेम करती थीं और जो कुछ समय पहले तक उन पर इतना स्नेह दिखा रहा था?
तब वसुदेव जी ने भारी हृदय से ऐसी बात कही, जिसे सुनकर वहाँ उपस्थित सभी लोगों का हृदय टूट गया— हे कंस! तुम्हें देवकी से कोई भय नहीं है। आकाशवाणी ने उसके पुत्र से तुम्हारे भय की बात कही है। इसलिए मैं वचन देता हूँ कि देवकी के जितने भी पुत्र जन्म लेंगे, मैं उन सभी को तुम्हारे हाथों सौंप दूँगा।”
कंस ने सन्देह से वसुदेव की ओर देखा और कठोर स्वर में कहा, “मैं तुम्हारी बात पर विश्वास कैसे करूँ? हो सकता है, बाद में तुम अपना वचन तोड़कर देवकी के साथ भाग जाओ।”
वसुदेव जी ने दृढ़ स्वर में कहा, “मैं आपको एक और वचन देता हूँ—देवकी की आठों संतानें होने तक हम मथुरा में ही रहेंगे और प्रत्येक संतान आपको सौंप देंगे।
फिर उन्होंने कहा, “यदि आप अब भी संतुष्ट नहीं हैं, तो मुझे आपके विरुद्ध तलवार उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। और यदि मेरी तलवार उठी, तो उसके साथ पूरा यादव वंश भी उठ खड़ा होगा। फिर जो विनाश होगा, उसे कोई नहीं रोक सकेगा।”
कंस ने वसुदेव जी की बात पर कुछ देर विचार किया। वह अभी-अभी अपने पिता से राज्य छीनकर राजा बना था और देवकी को मारना भी नहीं चाहता था। अन्ततः उसने वसुदेव जी का वचन स्वीकार कर लिया।
कंस ने तलवार नीचे की और ऊँचे स्वर में सैनिकों को पुकारा। उसके आदेश की आवाज़ सुनते ही सैनिक तुरन्त रथ के पास आकर खड़े हो गए।
कंस के आदेश पर सैनिक दौड़ते हुए आए और उन्होंने रथ को चारों तरफ से घेर लिया। वसुदेव जी देवकी की रक्षा के लिए उनके आगे खड़े हो गए।
एक ताकतवर सैनिक धीरे-धीरे रथ पर चढ़ा। वह राजा की बात मान रहा था, लेकिन देवकी और वसुदेव जी को देखकर उसके चेहरे पर दुख दिखाई दे रहा था।
सैनिकों ने देवकी और वसुदेव जी के हाथों में भारी बेड़ियाँ डाल दीं। उन्हें असहाय देखकर कंस कमर पर दोनों हाथ रखकर ज़ोर-ज़ोर से ठहाके मारते हुए हँसने लगा—“हा! हा! हा! हा!”
महाराज उग्रसेन, जो कंस के पिता हैं, अपने विश्वासपात्र साथियों और सैनिकों के साथ कंस के सामने खड़े होकर उसका विरोध करते हैं। वे गंभीर आवाज़ में कंस को रुकने और देवकी-वसुदेव के साथ अन्याय न करने का आदेश देते हैं
कंस बहुत दुष्ट और शक्तिशाली था। उसने अपनी विशाल सेना महाराज उग्रसेन और उनके सैनिकों के सामने खड़ी कर दी। बूढ़े महाराज उग्रसेन ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन कंस ने उनकी बात नहीं मानी और अपने ही पिता को बन्दी बना लिया।
कंस ने देवकी और वसुदेव को बन्दी बनाकर कारागार में डाल दिया। देवकी फूट-फूटकर रो रही थीं और अपने दोनों हाथों से आँसू पोंछ रही थीं। वसुदेव जी ने उन्हें सहारा देते हुए शांत स्वर में कहा,
“देवकी, सब नारायण पर छोड़ दो। कंस के पापों का अंत करने का विधान हो चुका है। अब इस नियति को कोई नहीं बदल सकता। वे बहुत दुखी थे, लेकिन उन्होंने धैर्य और विश्वास नहीं छोड़ा। कठिन समय में भी भगवान श्री विष्णु के प्रति उनकी भक्ति अटल रही।