कंस के अत्याचार से मथुरा की प्रजा बहुत दुःखी थी। उसके सैनिक लोगों के घरों से धन और अनाज छीन लेते थे। विरोध करने वाले निर्दोष लोगों को बन्दी बना लिया जाता था।
मथुरा के मार्गों पर हर समय कंस के सैनिक घूमते रहते थे। लोग अपने घरों में भी धीरे बोलते थे। किसी को नहीं पता था कि अगला अत्याचार किसके साथ होगा।
आकाशवाणी के बाद कंस को प्रत्येक यादव पर सन्देह होने लगा। उसने यादव परिवारों पर कड़ी दृष्टि रखने का आदेश दिया। अनेक लोग भय के कारण मथुरा छोड़ने लगे।
वसुदेव जी को अपनी पहली पत्नी रोहिणी जी की सुरक्षा की चिन्ता होने लगी। उन्हें भय था कि कंस उन्हें भी बन्दी बना सकता है। वह रोहिणी जी को मथुरा से दूर भेजना चाहते थे।
अक्रूर जी बुद्धिमान, शान्त और नारायण के सच्चे भक्त थे। वह कठिन समय में भी अपना धैर्य नहीं खोते थे। इसी कारण वसुदेव जी उन पर पूर्ण विश्वास करते थे।
वसुदेव जी ने अक्रूर जी को गुप्त रूप से बुलाया। उन्होंने कहा, “रोहिणी को सुरक्षित मथुरा से बाहर भेजना होगा।” अक्रूर जी ने यह उत्तरदायित्व स्वीकार कर लिया।
वसुदेव जी के प्रिय मित्र नन्द बाबा गोकुल में रहते थे। वहाँ का वातावरण शान्त था और कंस के सैनिक भी कम आते थे। रोहिणी जी के लिए वही सबसे सुरक्षित स्थान था।
अक्रूर जी ने रोहिणी जी की यात्रा के लिए सुरक्षित मार्ग का प्रबन्ध किया। उन्हें साधारण वस्त्र पहनाए गए, जिससे कोई उन्हें पहचान न सके। सब कार्य बहुत सावधानी से किया गया।
गहरी रात में रोहिणी जी एक ढकी हुई बैलगाड़ी में बैठकर मथुरा से निकलीं। नगर पीछे छूटता गया, पर उनका मन देवकी और वसुदेव जी के पास ही था।
यमुना पार करते समय रोहिणी जी ने हाथ जोड़कर नारायण से प्रार्थना की। उन्होंने देवकी और वसुदेव जी की रक्षा माँगी। उनके हृदय में भय के साथ विश्वास भी था।
नन्द बाबा और यशोदा मैया ने रोहिणी जी का प्रेमपूर्वक स्वागत किया। यशोदा मैया ने कहा, “यह आपका अपना घर है।” रोहिणी जी की आँखों में कृतज्ञता के आँसू आ गए
कुछ समय बाद देवकी जी ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम कीर्तिमान रखा गया। बालक को गोद में लेकर देवकी और वसुदेव जी का हृदय आनन्द से भर गया।
वसुदेव जी को कंस से किया हुआ अपना वचन स्मरण था। भारी हृदय से वह कीर्तिमान को लेकर कंस के पास गए। एक पिता के लिए यह बहुत कठिन परीक्षा थी।
कंस ने कहा, “आकाशवाणी ने आठवें पुत्र की बात कही थी। मुझे इस पहले पुत्र से कोई भय नहीं है।” उसने कीर्तिमान को वसुदेव जी के पास वापस भेज दिया।
कीर्तिमान को सुरक्षित देखकर देवकी जी ने उसे अपने हृदय से लगा लिया। उन्हें लगा कि शायद कंस अन्य पुत्रों को भी कोई हानि नहीं पहुँचाएगा। कारागार में कुछ समय के लिए आशा लौट आई।
एक दिन वीणा बजाते हुए देवर्षि नारद कंस के महल में पहुँचे। कंस ने उनका सम्मान किया। नारद जी उसे देवताओं की एक गुप्त योजना बताने आए थे।
नारद जी ने कहा, “अनेक देवता यादव और वृष्णि कुल में जन्म ले चुके हैं। वे भगवान विष्णु के दिव्य कार्य में सहायता करेंगे।” यह सुनकर कंस के मन में भय बढ़ने लगा।
नारद जी ने आठ पंखुड़ियों वाला कमल उठाया। उन्होंने समझाया, “जिस पंखुड़ी से गिनती आरम्भ होगी, वही पहली होगी और कोई भी पंखुड़ी आठवीं बन सकती है।” कंस सोचने लगा कि कोई भी पुत्र उसका काल हो सकता है।
नारद जी ने बताया कि पिछले जन्म में कंस कालनेमि नामक असुर था। भगवान विष्णु ने उस जन्म में भी उसका अन्त किया था। यह सुनते ही कंस का भय क्रोध में बदल गया।
अपने प्राण बचाने की चिन्ता में कंस की बुद्धि भ्रष्ट हो गई। उसने निश्चय किया कि देवकी की कोई भी सन्तान जीवित नहीं बचेगी। उसने कारागार का पहरा और अधिक कठोर कर दिया।
नारद जी बालकों की हत्या नहीं चाहते थे। वह जानते थे कि कंस के पाप शीघ्र अपनी सीमा तक पहुँचेंगे, तो उसके अन्त का समय भी निकट आएगा। परन्तु पाप करने का निर्णय स्वयं कंस ने लिया था।
देवकी के छह पुत्र पूर्वजन्म में मरीचि के पुत्र थे। एक पुराने शाप के कारण उन्हें कालनेमि से जुड़े अपने ही कुल के हाथों मृत्यु पानी थी। इस जन्म में वही कालनेमि कंस बना था।
कंस ने अपना पहला निर्णय बदल दिया और कीर्तिमान को मँगवा लिया। देवकी जी ने हाथ जोड़कर दया की प्रार्थना की। परन्तु कंस ने उनके प्रथम पुत्र की हत्या कर दी।
समय बीता और देवकी जी ने अपने दूसरे पुत्र सुषेण को जन्म दिया। माता-पिता ने उसे प्रेम से अपने हृदय से लगाया। पर कंस ने उस निर्दोष बालक को भी उनसे छीन लिया।
तीसरे पुत्र भद्रसेन के जन्म से कारागार में फिर छोटी-सी आशा जागी। देवकी जी प्रेम से उसके नन्हे मुख को देखती रहीं। शीघ्र ही कंस के सैनिक उसे भी ले गए।
चौथे पुत्र का नाम ऋजु रखा गया। उसकी छोटी-सी मुस्कान देखकर देवकी जी का उदास चेहरा खिल उठता था। पर कंस ने यह सुख भी उनसे छीन लिया।
पाँचवें पुत्र सम्मर्दन के जन्म पर देवकी जी हर आहट से डरने लगीं। वह उसे अपनी छाती से कसकर लगाए रहीं। फिर भी कंस ने उस बालक को जीवित नहीं छोड़ा।
छठे पुत्र भद्र के जन्म पर देवकी जी ने कंस को रोकने का बहुत प्रयास किया। कंस के कारागार में आते ही उन्होंने रोते हुए विनती की, “भैया, यह निर्दोष बालक है। कृपा करके इसे छोड़ दो।” परन्तु कठोर हृदय कंस ने उनकी एक न सुनी और उनकी करुण पुकार को अनदेखा कर दिया।
अपने छह पुत्रों को खोकर देवकी जी पूरी तरह टूट गईं। वसुदेव जी स्वयं दुःखी थे, फिर भी उन्होंने उन्हें धैर्य दिया और भगवान पर विश्वास बनाए रखने को कहा।
उस रात कारागार का अन्धकार पहले जैसा ही था, पर देवकी जी के हृदय में एक अनजानी शान्ति उतर आई। उन्हें लगा, जैसे दूर कहीं आशा का एक छोटा-सा दीप जल उठा हो। दुःख अभी समाप्त नहीं हुआ था, पर एक नई प्रभात धीरे-धीरे निकट आ रही थी।