क्षीरसागर में विराजमान भगवान विष्णु जी ने देवी योगमाया का आह्वान किया **(उन्हें बुलाया)**। देवी योगमाया को भवानी भी कहा जाता है। जैसे विष्णु जी को आदर से भगवान कहा जाता है, वैसे ही देवी माँ को भवानी कहकर पुकारा जाता है। वह भगवान की लीलाओं में सहायता करती हैं।
देवी भवानी के प्रकट होते ही क्षीरसागर दिव्य तेज से चमक उठा। भगवान विष्णु जी ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। देवी माँ ने भी हाथ जोड़कर नारायण को प्रणाम किया।
भगवान विष्णु जी ने कहा, “ हे भवानी !!!, पृथ्वी पर एक महान लीला का नया चरण आरम्भ होने वाला है।” देवी योगमाया ने उत्तर दिया, “नारायण, इस लीला में मुझे कौन-सा कार्य पूरा करना है?”
नारायण ने कहा, “देवकी के सातवें गर्भ में अनन्त देव स्थित हैं। कंस से उनकी रक्षा करनी है। उन्हें देवकी के गर्भ से गोकुल में रह रही रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दो।”
अनन्त देव कोई साधारण नहीं थे। वह सदा नारायण के साथ रहते और उनकी सेवा करते हैं। अब वह पृथ्वी पर प्रभु की दिव्य लीला में सहायता करने आने वाले थे।
अनन्त देव को ही शेषनाग कहा जाता है। क्षीरसागर में नारायण उनकी विशाल कुण्डलियों पर विराजमान रहते हैं। उनके असंख्य फन प्रभु के ऊपर दिव्य छाया करते हैं।
अनंत देव अत्यन्त शक्तिशाली हैं, पर उनका मन सदा भगवान नारायण की सेवा में लगा रहता है। इस बार वे नारायण से पहले पृथ्वी पर आएँगे और उनके बड़े भाई के रूप में जन्म लेंगे।
मथुरा के कारागार में देवकी जी ने अपने भीतर फिर एक नए जीवन की उपस्थिति अनुभव की। यह उनकी सातवीं सन्तान थी। उनके हृदय में आशा जागी, पर कंस का भय भी बना रहा।
देवकी जी प्रतिदिन अपने हाथ गर्भ पर रखकर कहतीं, “हे नारायण, मेरे बालक की रक्षा कीजिए।” पिछले छह पुत्रों की स्मृति से उनकी आँखें भर आतीं। फिर भी उन्होंने विश्वास नहीं छोड़ा।
वसुदेव जी को इस बार कारागार में एक विशेष शान्ति अनुभव हो रही थी। उन्होंने देवकी जी से कहा, “इस बालक के साथ कोई दिव्य रहस्य जुड़ा है।” दोनों ने हाथ जोड़कर नारायण का स्मरण किया।
कंस को पता चला कि देवकी जी सातवीं बार गर्भवती हैं। उसने कारागार के चारों ओर पहरा और कठोर कर दिया। वह बालक के जन्म की प्रतीक्षा करने लगा।
कंस को दिन-रात आकाशवाणी के शब्द स्मरण आते थे। वह सोचता, “क्या यही सन्तान मेरे अन्त का कारण बनेगी?” भय के कारण उसे रात में भी नींद नहीं आती थी।
देवी योगमाया ने नारायण की बात सुनकर कहा, “नारायण, अनन्त देव सुरक्षित गोकुल पहुँचेंगे।” नारायण ने उनकी ओर देखकर सिर झुकाया। देवी भवानी दिव्य कार्य पूरा करने चल पड़ीं।
उस रात देवकी और वसुदेव जी गहरी निद्रा में थे। कारागार में एक कोमल दिव्य प्रकाश फैल गया। उसी प्रकाश के बीच देवी योगमाया प्रकट हुईं।
देवी योगमाया ने देवकी जी के गर्भ में स्थित अनन्त देव की ओर देखा। अपनी दिव्य शक्ति से उन्होंने अनन्त देव को बिना किसी पीड़ा के गर्भ से बाहर निकाला। देवकी और वसुदेव जी सोते रहे।
देवी योगमाया ने अपनी दिव्य शक्ति से अनन्त देव को बिना किसी पीड़ा के देवकी जी के गर्भ से बाहर निकाला। देवकी और वसुदेव जी गहरी निद्रा में रहे। किसी को भी इस दिव्य घटना का पता नहीं चला।
देवी योगमाया अनन्त देव को लेकर उसी क्षण गोकुल की ओर चलीं। कारागार के बाहर सैनिक पहले की तरह पहरा देते रहे। उन्हें भीतर हुई दिव्य घटना का कोई ज्ञान नहीं हुआ।
गोकुल में रोहिणी जी नन्द बाबा के घर में सुरक्षित रह रही थीं। उस रात वह अपने कक्ष में शान्ति से सो रही थीं। उन्हें आने वाले दिव्य परिवर्तन का कोई ज्ञान नहीं था।
रोहिणी जी गहरी निद्रा में थीं। उनके कक्ष में एक कोमल दिव्य प्रकाश फैल गया और देवी योगमाया उनके पास प्रकट हुईं। रोहिणी जी को कुछ पता नहीं चला।
देवी योगमाया ने अनन्त देव को सुरक्षित रोहिणी जी के गर्भ में स्थापित कर दिया। उसी क्षण रोहिणी जी के मुख पर एक कोमल मुस्कान आ गई। देवी भवानी का कार्य पूरा हो गया।
प्रातः देवकी जी ने अपने भीतर एक बड़ा परिवर्तन अनुभव किया। उन्हें गर्भ में बालक की उपस्थिति अनुभव नहीं हुई। वह इस रहस्य को समझ नहीं सकीं और रोने लगीं।
कंस सातवें बालक के जन्म की प्रतीक्षा कर रहा था। वह बार-बार सैनिकों से पूछता, “देवकी की सन्तान का जन्म कब होगा?” कई दिन बीत गए, पर बालक के जन्म का कोई समाचार नहीं आया।
देवी योगमाया अनन्त देव को लेकर उसी क्षण गोकुल की ओर चलीं। कारागार के बाहर सैनिक पहले की तरह पहरा देते रहे। उन्हें भीतर हुई दिव्य घटना का कोई ज्ञान नहीं हुआ।
देवकी जी को लगा कि उन्होंने अपनी सातवीं सन्तान भी खो दी है। वह कारागार के एक कोने में बैठकर रोने लगीं। पिछले छह पुत्रों का दुःख फिर उनके सामने आ गया।
वसुदेव जी ने देवकी जी को सम्भालकर कहा, “नारायण की लीला को समझना सरल नहीं है।” उन्हें भीतर से अनुभव हो रहा था कि इस घटना के पीछे कोई दिव्य रहस्य है।
उसी समय गोकुल में रोहिणी जी ने अपने भीतर एक नए जीवन की उपस्थिति अनुभव की। उनका हृदय शान्ति और आनन्द से भर गया। यशोदा मैया उनकी देखभाल करने लगीं।
शुभ समय आने पर रोहिणी जी ने एक सुन्दर और तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। बालक के मुख पर चन्द्रमा जैसा कोमल प्रकाश था। स्वयं अनन्त शेषनाग नन्हे बालक के रूप में गोकुल आ गए थे।
नन्हे बलराम जी के आगमन से गोकुल आनन्द से भर गया। मथुरा का अन्धकार अभी समाप्त नहीं हुआ था, पर अदृश्य रूप से एक और महान लीला की तैयारी आरम्भ हो चुकी थी। संसार अनजान था कि आशा की सबसे उज्ज्वल किरण अब बहुत निकट थी।