अनन्त देव के गोकुल पहुँचने के बाद भगवान की योजना का अगला भाग आरम्भ हुआ। मथुरा का कारागार अभी भी अन्धकार में था। पर अब वहाँ एक महान प्रकाश आने वाला था।
नारायण की दिव्य शक्ति वसुदेव जी के हृदय में प्रकट हुई। उनका मन शान्त हो गया और मुख पर तेज आ गया। उन्हें लगा कि प्रभु के आने का समय पास है।
वसुदेव जी के हृदय से वह दिव्य शक्ति देवकी जी के हृदय में पहुँची। देवकी जी ने अपने भीतर एक अनोखी शान्ति अनुभव की। कुछ समय के लिए वह कारागार का दुःख भूल गईं।
कुछ समय बाद देवकी जी ने अपने भीतर एक नए जीवन का अनुभव किया। यह उनकी आठवीं सन्तान थी। उनके मन में आशा जागी, पर कंस का भय भी बना रहा।
अपने छह पुत्रों को याद करके देवकी जी की आँखें भर आतीं। सातवीं सन्तान का रहस्य भी वह समझ नहीं पाई थीं। वह आठवीं सन्तान की रक्षा के लिए हर दिन प्रार्थना करतीं।
भय के बाद भी इस बार देवकी जी के मन में गहरी शान्ति थी। उन्हें लगता था कि यह बालक किसी बड़े कार्य के लिए आ रहा है। वह अपने गर्भ पर हाथ रखकर नारायण का स्मरण करतीं।
वसुदेव जी ने कहा, “देवकी, इस बार मुझे भी एक दिव्य शान्ति अनुभव हो रही है।” उन्होंने देवकी जी से विश्वास बनाए रखने को कहा। दोनों ने हाथ जोड़कर नारायण को प्रणाम किया।
समय बीतने के साथ देवकी जी का मुख चमकने लगा। कारागार का अन्धकार भी उनके तेज को छिपा नहीं सका। वसुदेव जी उन्हें देखकर समझ गए कि यह कोई साधारण गर्भ नहीं है।
एक दिन कंस देवकी जी को देखने कारागार में आया। उनके मुख का तेज देखकर वह वहीं रुक गया। उसने सोचा, “विष्णु अवश्य इनके गर्भ में आ चुके हैं।”
एक क्षण के लिए कंस ने गर्भवती देवकी जी को मारने का विचार किया। फिर उसने सोचा कि अपनी गर्भवती बहन को मारने से उसका नाम, मान और जीवन नष्ट हो जाएगा। इसलिए उसने बालक के जन्म तक प्रतीक्षा करने का निश्चय किया।
अब कंस को खाते, चलते और सोते समय भी विष्णु का ही विचार आता था। हर आवाज सुनकर वह डर जाता। उसे लगता था कि उसका अन्त पास आ रहा है।
धीरे-धीरे सभी दिशाएँ साफ और शान्त दिखाई देने लगीं।
आकाश पहले से अधिक सुन्दर लगने लगा। प्रकृति किसी शुभ समय की तैयारी कर रही थी।
तालाबों में सुन्दर कमल खिल उठे। उनकी मीठी सुगन्ध चारों ओर फैल गई। भँवरे फूलों के पास गूँजने लगे।
ठण्डी और सुगन्धित हवा बहने लगी। लोगों के मन का भारीपन कम होने लगा। उन्हें बिना कारण ही शान्ति अनुभव होने लगी।
गायें अपने बछड़ों के पास प्रसन्न होकर खड़ी थीं। वे पहले से अधिक दूध देने लगीं। वन के पशु भी शान्त दिखाई दे रहे थे।
ऋषियों के आश्रमों में यज्ञ की अग्नि शान्त होकर जलने लगी। मन्त्रों की आवाज मधुर सुनाई देने लगी। ऋषियों ने इसे शुभ संकेत माना।
वनों में ध्यान कर रहे ऋषियों के मन आनन्द से भर गए। उन्हें लगा कि धर्म की रक्षा का समय पास है। उन्होंने नारायण को प्रणाम किया।
दिव्य लोक में ब्रह्मा जी, शिव जी, नारद जी और दूसरे देवता एकत्र हुए। उन्हें पता था कि नारायण देवकी जी के गर्भ में हैं। वे उनकी स्तुति करने मथुरा की ओर चले।
सभी देवता ऐसे रूप में देवकी जी के कक्ष में आए कि कोई उन्हें देख नहीं सका। देवकी और वसुदेव जी भी उन्हें नहीं देख पाए। फिर भी कारागार में गहरी शान्ति फैल गई।
शिव जी ने प्रेम और भक्ति से नारायण को प्रणाम किया। उसी समय देवकी माँ के गर्भ में स्थित नारायण ने भी शिव जी को प्रणाम किया। दोनों के बीच गहरा प्रेम और आदर था।
उसी समय गोकुल में देवी योगमाया यशोदा मैया के गर्भ में थीं। यशोदा मैया ने अपने भीतर एक कोमल दिव्य शक्ति अनुभव की। उन्हें इस रहस्य का पता नहीं था।
यशोदा मैया पहले से अधिक शान्त और प्रसन्न रहने लगीं। उनके मन में किसी बात का भय नहीं था। उन्हें लगता था कि उनके घर में कोई बड़ा सुख आने वाला है।
जैसे-जैसे जन्म का समय पास आया, कंस का भय बढ़ता गया। उसने कारागार के बाहर और सैनिक खड़े कर दिए। उसने आदेश दिया कि बालक के जन्म की खबर उसे तुरन्त दी जाए।
गोकुल के आकाश में घने काले बादल छा गए और रात गहरी होने लगी। नन्द भवन के भीतर यशोदा मैया अपने कक्ष में शान्ति से विश्राम कर रही थीं। उन्हें पता नहीं था कि एक महान दिव्य लीला आरम्भ होने वाली है।
आकाश में घने काले बादल छा गए और रात गहरी होने लगी। देवकी जी कारागार में लेटी हुई थीं। चारों ओर गहरा सन्नाटा था।
आधी रात पास आ रही थी। कारागार के बाहर बादल गरज रहे थे, पर भीतर एक कोमल दिव्य प्रकाश फैलने लगा। वह महान क्षण अब बहुत निकट था, जब स्वयं नारायण प्रकट होने वाले थे।