नन्द भवन में यशोदा मैया अपने कमरे में शांतिपूर्वक सो रही थीं। तभी देवी योगमाया दिव्य रूप में उनके सामने प्रकट हुईं।
उसी रात नन्द भवन में एक दिव्य लीला हुई। गहरी नींद में सो रही यशोदा मैया के यहाँ देवी योगमाया ने एक नन्ही कन्या के रूप में जन्म लिया। किसी को इस दिव्य जन्म का पता नहीं चला।
उसी दिव्य रात देवी योगमाया की शक्ति से पूरा गोकुल गहरी नींद में सो गया। यशोदा मैया को सन्तान के जन्म और उसके पुत्र या पुत्री होने का भी ज्ञान नहीं हुआ।
उसी समय मथुरा के कारागार में भी योगमाया की दिव्य शक्ति का प्रभाव हुआ। सभी पहरेदार अचानक गहरी नींद में सो गए। जो सैनिक कुछ समय पहले तक कड़ा पहरा दे रहे थे, अब उन्हें आसपास हो रही किसी भी बात का पता नहीं था।
तभी वसुदेव जी की बेड़ियाँ अपने-आप खुल गईं। उन्होंने आश्चर्य और भक्ति से अपने पास लेटे नन्हे बालकृष्ण की ओर देखा।
एक-एक करके कारागार के बन्द द्वार भी अपने-आप खुलने लगे। वसुदेव जी समझ गए कि यह भगवान की दिव्य व्यवस्था है और अब उन्हें बालकृष्ण को सुरक्षित गोकुल पहुँचाना है।
वसुदेव जी ने नन्हे बालकृष्ण को बहुत सावधानी से एक टोकरी में रखा। उन्होंने टोकरी को अपने सिर पर उठाया और चुपचाप कारागार से बाहर निकल पड़े।
बाहर घनघोर रात थी। काले बादल गरज रहे थे और तेज वर्षा हो रही थी। फिर भी वसुदेव जी अपने कदम रोके बिना गोकुल की ओर बढ़ते रहे।
तभी अनन्त शेषनाग प्रकट हुए। उन्होंने अपने विशाल फनों को नन्हे बालकृष्ण के ऊपर छत्र की तरह फैला दिया और वर्षा से उनकी रक्षा करने लगे।
कुछ दूर चलने के बाद वसुदेव जी यमुना नदी के तट पर पहुँचे। तेज वर्षा के कारण नदी उफान पर थी और जल का प्रवाह बहुत तेज था।
वसुदेव जी ने बालकृष्ण की टोकरी को अपने सिर के ऊपर सुरक्षित रखा और यमुना में उतर गए। जल बढ़ता गया, लेकिन भगवान पर उनका विश्वास नहीं डगमगाया।
तभी यमुना का जल धीरे-धीरे ऊपर उठा और नन्हे बालकृष्ण के चरणों को छू लिया। मानो यमुना मैया स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श करके उनका स्वागत करना चाहती हों।
बालकृष्ण के चरणों का स्पर्श पाते ही यमुना का प्रचण्ड प्रवाह शांत होने लगा। वसुदेव जी के लिए सुरक्षित मार्ग बन गया और वे धीरे-धीरे नदी के दूसरी ओर पहुँच गए।
रात के अँधेरे में वसुदेव जी आखिरकार गोकुल पहुँच गए। योगमाया के प्रभाव से पूरा गोकुल अब भी गहरी नींद में था।
नन्द भवन में भी चारों ओर शांति थी। सभी लोग गहरी नींद में सो रहे थे। वसुदेव जी बिना किसी को जगाए धीरे-धीरे यशोदा मैया के कक्ष तक पहुँचे।
यशोदा मैया गहरी नींद में थीं और उनके पास नन्ही योगमाया कन्या लेटी थी। वसुदेव जी ने बालकृष्ण को बहुत प्रेम और सावधानी से यशोदा मैया के पास लिटा दिया।
फिर वसुदेव जी ने नन्ही कन्या को बहुत सावधानी से उठाया। किसी को उनके आने का पता नहीं चला और वे योगमाया को लेकर वापस मथुरा की ओर चल पड़े।
वसुदेव जी ने एक बार फिर यमुना पार की और सुरक्षित मथुरा के कारागार पहुँच गए। उन्होंने नन्ही योगमाया कन्या को देवकी जी के पास लिटा दिया।
वसुदेव जी के वापस आते ही सब कुछ फिर पहले जैसा हो गया। कारागार के द्वार अपने-आप बन्द हो गए और उनकी बेड़ियाँ भी फिर से लग गईं।
नन्द बाबा को जैसे ही पता चला कि उनके घर पुत्र का जन्म हुआ है, उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पूरा नन्द भवन आनन्द और उत्साह से भर गया।
जल्द ही पूरे गोकुल में यह शुभ समाचार फैल गया— “नन्द बाबा और यशोदा मैया के यहाँ पुत्र हुआ है!” गोप और गोपियाँ खुशी से नन्द भवन की ओर आने लगे। हर ओर नन्हे कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाने लगा।
उधर मथुरा के कारागार में नन्ही कन्या अचानक रोने लगी। उसकी आवाज सुनते ही पहरेदारों की गहरी नींद खुल गई।
पहरेदारों ने देवकी जी के पास नवजात कन्या को देखा। वे समझ गए कि देवकी जी की आठवीं संतान का जन्म हो चुका है।
सैनिक तुरंत कन्स के महल पहुँचे और बोले, “महाराज! देवकी की आठवीं संतान का जन्म हो गया है!” यह सुनते ही कन्स घबरा उठा। आकाशवाणी की बात फिर उसके मन में गूंजने लगी और वह जल्दी से कारागार की ओर चल पड़ा
कारागार पहुँचकर कन्स ने देखा कि देवकी जी की गोद में एक नन्ही कन्या थी। वह एक पल के लिए हैरान रह गया। उसने सोचा था कि आठवीं संतान एक पुत्र होगा, लेकिन उसके सामने एक कन्या थी।
देवकी जी ने कन्स से विनती की, “भैया, यह तो एक नन्ही कन्या है। इससे तुम्हें क्या भय? कृपा करके इसे छोड़ दो।”
लेकिन भविष्यवाणी के भय ने कन्स की बुद्धि को ढक लिया था। उसने देवकी जी की गोद से नन्ही कन्या को ले लिया। देवकी जी उससे बार-बार विनती करती रहीं ।
जैसे ही कन्स ने उस नन्ही कन्या को मारने का प्रयास किया, वह अचानक उसके हाथों से छूट गई। देखते ही देखते वह ऊपर आकाश की ओर चली गई।
क्षण भर में वह नन्ही कन्या एक तेजस्वी देवी योगमाया के रूप में प्रकट हुई। उनके दिव्य प्रकाश से पूरा कारागार जगमगा उठा। कन्स भय और आश्चर्य से आकाश की ओर देखता रह गया।
तब देवी योगमाया ने कन्स को चेतावनी दी— “मूर्ख कन्स! तू मेरा वध क्या करेगा? तेरा वध करने वाला तो कहीं और जन्म ले चुका है।”
देवी योगमाया की चेतावनी सुनकर कन्स बुरी तरह डर गया। वह देवकी जी और वसुदेव जी के चरणों में गिरकर बोला, “मुझे क्षमा कर दीजिए, मैंने आपके साथ बहुत अन्याय किया।”
कन्स ने देवकी जी और वसुदेव जी की लोहे की बेड़ियाँ खुलवा दीं और उन्हें बन्दी जीवन से मुक्त कर दिया। लेकिन कन्स के शासन और भय के कारण वे मथुरा में ही रहे, जबकि नन्हे श्रीकृष्ण गोकुल में सुरक्षित थे।
कन्स ने देवकी जी और वसुदेव जी की लोहे की बेड़ियाँ खुलवा दीं और उन्हें बन्दी जीवन से मुक्त कर दिया। लेकिन कन्स के शासन और भय के कारण वे मथुरा में ही रहे, जबकि नन्हे श्रीकृष्ण गोकुल में सुरक्षित थे।
देवी योगमाया की बात सुनकर कन्स बहुत डर गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि उसकी पहुँच से दूर कहीं उसकी मृत्यु का कारण जन्म ले चुका है।