अगली सुबह मथुरा की राजसभा में कन्स ने अपने असुर मन्त्रियों को बुलाया। मन्त्रियों ने दस दिन के आसपास जन्मे शिशुओं को नगरों, गाँवों और गोप बस्तियों में खोजने की क्रूर योजना बताई। कन्स ने तुरन्त आदेश दिया, “कोई स्थान छूटना नहीं चाहिए!”
कन्स ने शक्तिशाली राक्षसी पूतना को बुलाया। अपने विशाल और भयावह रूप में वह कन्स के सामने आ खड़ी हुई। हल्की मुस्कान के साथ पूतना बोली, “महाराज, वह बालक कौन है जिसकी आपको इतनी चिन्ता है?”
कन्स ने कहा, “वही बालक मेरा काल है। उसे नवजात शिशुओं के बीच खोजो और मेरा यह भय समाप्त करो।” पूतना ने कन्स की ओर देखा और बोली, “मैं उसे ढूँढ निकालूँगी।”
कन्स का आदेश मिलते ही पूतना अपने असली विशाल राक्षसी रूप में मथुरा से निकल पड़ी। वह आकाश मार्ग से नगरों, गाँवों और दूर की बस्तियों की ओर बढ़ने लगी।
पर भगवान नारायण की लीला अद्भुत थी। पूतना जिन शिशुओं का वध कर सकी, वे साधारण बालक नहीं थे। वे मनुष्य रूप में जन्मे राक्षस थे, जो पृथ्वी पर असुरी शक्ति बढ़ाने आए थे।
एक के बाद एक बस्ती पीछे छूटती गई, पर कन्स का असली शत्रु पूतना को कहीं नहीं मिला। झुँझलाकर वह बोली, “आखिर वह बालक छिपा कहाँ है?”
तभी दूर से उसे हरे मैदान, गायों के झुण्ड और सुन्दर ब्रजभूमि दिखाई दी। पूतना कुछ पल ठहरकर उस शान्त और हरी-भरी भूमि को देखने लगी।
सामने नन्द बाबा का गोकुल था, जहाँ नन्हे श्रीकृष्ण उस समय लगभग छह दिन के थे। पूतना की दृष्टि गोकुल पर टिक गई—“शायद मेरी खोज यहीं पूरी होगी।”
पूतना ने अपने विशाल राक्षसी रूप को देखा और समझ गई कि ऐसे गोकुल में प्रवेश करना आसान नहीं होगा। वह मुस्कराई, “पहले अपना रूप बदलना होगा।”
पूतना ने अपनी मायावी शक्ति का प्रयोग किया और उसका भयानक रूप बदलने लगा। उसका विशाल शरीर छोटा हुआ और उसके चारों ओर चमकती माया फैल गई।
क्षण भर में वही भयावह राक्षसी एक अत्यन्त सुन्दर और सजी हुई स्त्री बन चुकी थी। अपने नये रूप को देखकर पूतना मुस्कराई, “अब मुझे कौन पहचान पाएगा?”
सुन्दर रूप में पूतना गोकुल की गलियों से गुज़री तो गोपियाँ उसे देखने लगीं। वे आपस में बोलीं, “यह सुन्दर स्त्री कौन है? इसे पहले कभी नहीं देखा।”
पूतना मधुर मुस्कान के साथ आगे बढ़ती रही, पर उसकी आँखें लगातार किसी नवजात बालक को खोज रही थीं। तभी उसकी दृष्टि नन्द भवन पर जाकर ठहर गई।
पूतना बिना झिझक नन्द भवन के अन्दर चली गई। वहाँ यशोदा मैया और रोहिणी जी अपने नन्हे श्रीकृष्ण के पास थीं।
तभी पूतना की दृष्टि पालने में लेटे छह दिन के नन्हे श्रीकृष्ण पर पड़ी और वह एक पल ठहर गई। मन में बोली, “क्या यही वह बालक है जिससे कन्स इतना डरता है?”
श्रीकृष्ण पूतना के मन में छिपे हर विचार को पहले से जानते थे। उसे पास आते देखकर नन्हे प्रभु ने धीरे से अपनी कमल जैसी आँखें बन्द कर लीं।
पूतना पालने के पास झुकी और नन्हे श्रीकृष्ण को धीरे से अपनी गोद में उठा लिया। इतने छोटे बालक को देखकर उसके चेहरे पर फिर वही आत्मविश्वास लौट आया।
पूतना ने दूध पिलाने के लिए पहले से ही अत्यन्त घातक विष लगा रखा था। श्रीकृष्ण को दूध पिलाते हुए उसने मन में सोचा, “बस कुछ ही क्षण…”
जैसे ही श्रीकृष्ण ने दूध पीना आरम्भ किया, उन्होंने पूतना को अपने दोनों नन्हे हाथों से मज़बूती से पकड़ लिया। पूतना अचानक चौंक उठी—उसने एक नवजात शिशु से ऐसी शक्ति की कल्पना नहीं की थी।
पूतना की मुस्कान अचानक गायब हो गई और उसकी आँखें डर से फैल गईं। वह घबराकर बोली, “यह… यह कैसा बालक है?”
विष का श्रीकृष्ण पर तनिक भी प्रभाव नहीं हुआ; उलटे वे पूतना की राक्षसी जीवन शक्ति खींचने लगे। जो पूतना दूसरों को डराती थी, अब वही स्वयं कमज़ोर पड़ने लगी।
पूतना ने हाथ-पाँव पटककर स्वयं को छुड़ाने की पूरी कोशिश की। डर से काँपती हुई वह चीखी, “मुझे छोड़ दो! बस… मुझे छोड़ दो!”
उसके संघर्ष के साथ ही पूतना का सुन्दर मायावी रूप टूटने लगा। उसका चेहरा बदलने लगा और शरीर फिर से विशाल होता गया।
क्षण भर में सुन्दर स्त्री का रूप मिट गया और विशाल राक्षसी पूतना सबके सामने प्रकट हो गई। पर नन्हे श्रीकृष्ण अब भी उसे मज़बूती से पकड़े हुए थे।
पूतना ने ऐसी भयंकर चीख लगाई कि पूरा गोकुल गूँज उठा। ब्रजवासी अपने घरों से बाहर निकलकर आश्चर्य और भय से उस विशाल राक्षसी को देखने लगे।
आखिर पूतना की सारी शक्ति समाप्त हो गई और उसका विशाल शरीर खुले मैदान में धरती पर जा गिरा। उसके गिरते ही चारों ओर धूल का बड़ा बादल फैल गया।
धूल छँटी तो सबने अद्भुत दृश्य देखा—विशाल पूतना के वक्ष पर नन्हे श्रीकृष्ण आराम से खेल रहे थे। इतनी बड़ी राक्षसी हार गई थी, पर छोटे से कान्हा बिल्कुल निडर थे।
यशोदा मैया और रोहिणी जी दौड़कर पहुँचीं, और मैया ने तुरन्त अपने लाला को गोद में उठा लिया। श्रीकृष्ण को सुरक्षित देखकर यशोदा मैया ने उन्हें प्रेम से अपने हृदय से लगा लिया।
गोपियों ने भगवान विष्णु के पवित्र नाम लेकर नन्हे श्रीकृष्ण की मंगल रक्षा की। यशोदा मैया ने गाय की पूँछ नन्हे कान्हा के चारों ओर घुमाकर उन्हें प्रेम से आशीर्वाद दिया।
श्रीकृष्ण प्रेम की छोटी-सी भावना को भी कभी नहीं भूलते। और पूतना की कहानी में भी एक ऐसी ही पुरानी बात थी… जिसकी शुरुआत उसके पिछले जन्म में हुई थी।
उस पिछले जन्म में पूतना राजा बलि की पुत्री रत्नमाला थी। एक दिन उसने अपने पिता की सभा में छोटे और सुन्दर वामन भगवान को देखा।
वामन भगवान का प्यारा बाल रूप देखकर रत्नमाला के हृदय में ममता जाग उठी। उसने सोचा, “काश मैं भी इस प्यारे बालक को अपनी गोद में लेकर दूध पिला पाती।”
लेकिन जब वामन भगवान ने तीन पग में राजा बलि का राज्य ले लिया, तो रत्नमाला का प्यार क्रोध में बदल गया। गुस्से में उसने सोचा, “जिस बालक को मैं दूध पिलाना चाहती थी, अब उसी को विष देकर मार दूँ!”
अगले जन्म में वही रत्नमाला राक्षसी पूतना बनी, और उसने श्रीकृष्ण को दूध पिलाया। श्रीकृष्ण ने उसे माता जैसा स्थान दिया; उनके दिव्य स्पर्श से उसके पाप मिट गये और उसे मुक्ति प्राप्त हुई।
बाद में जब पूतना के विशाल शरीर का अन्तिम संस्कार हुआ, तब उससे अगरु जैसी दिव्य सुगन्ध फैलने लगी। श्रीकृष्ण की कृपा ऐसी थी कि उन्हें हानि पहुँचाने आई पूतना को भी माता जैसा स्थान मिल गया।