जब पूतना के वध का समाचार मथुरा पहुँचा, कन्स क्रोध से भर गया। वह सोचने लगा, “इतना छोटा बालक शक्तिशाली पूतना से कैसे बच गया?”
पूतना की हार ने कन्स को भीतर तक हिला दिया था। कुछ समय बाद उसने हवा जैसे शरीर वाले असुर शकटासुर को अपने महल में बुलाया। उसने आदेश दिया, “गोकुल जाओ और उस बालक का अन्त कर दो!”
शकटासुर घमण्ड से हँसा, “मुझे कोई देख भी नहीं सकता।” “उस बालक को संकट आने का पता तक नहीं चलेगा!”
अगले ही पल शकटासुर हवा का तेज़ झोंका बनकर मथुरा से निकल पड़ा। पर उसे शरीर के बिना क्यों भटकना पड़ता था? इसके पीछे एक पुरानी कथा थी।
बहुत पहले उसका नाम उत्कच था और वह हिरण्याक्ष का पुत्र था। उसे अपनी विशाल शक्ति पर बहुत घमण्ड था।
एक दिन उत्कच लोमश मुनि के शान्त आश्रम में जा पहुँचा। अपने बल के घमण्ड में उसने जान-बूझकर वहाँ के वृक्ष और कोमल पौधे कुचल दिए।
लोमश मुनि ने कहा, “तुम्हें अपने विशाल शरीर का बहुत घमण्ड है!” “अब तुम शरीरहीन होकर हवा जैसे भटकते रहोगे।”
अपनी भूल समझकर उत्कच ने मुनि से क्षमा माँगी। मुनि बोले, “एक दिन श्रीहरि के चरण-स्पर्श से तुम्हें मुक्ति मिलेगी।”
वही शरीरहीन उत्कच आगे चलकर शकटासुर कहलाया। वह मुनि का वरदान भूल चुका था, पर श्रीहरि कुछ भी नहीं भूले थे।
एक ओर शकटासुर हवा बनकर गोकुल की ओर बढ़ रहा था। दूसरी ओर ब्रज में नन्हे कान्हा की मीठी किलकारियाँ गूँज रही थीं।
तीन महीने के कान्हा पालने में खिलखिलाते हुए करवट लेने का प्रयास करने लगे। यशोदा मैया का चेहरा खिल उठा—बच्चे के करवट लेना सीखने की इसी खुशी को उत्थान उत्सव के रूप में मनाया जाता था।
कान्हा को करवट लेने का प्रयास करते देखकर यशोदा मैया का चेहरा खिल उठा। यह शुभ समाचार फैलते ही नन्द भवन में उत्सव की तैयारियाँ शुरू हो गईं।
नन्द भवन का आँगन फूलों, आम के पत्तों और रंगोली से सजाया गया। ब्रज की गोपियाँ उपहार लेकर मंगलगीत गाती हुई आने लगीं।
यशोदा मैया ने कान्हा को प्रेम से मंगल स्नान कराया। ब्राह्मणों के शुभ मन्त्रों और मधुर संगीत से पूरा आँगन गूँज उठा।
स्नान के बाद कान्हा सुन्दर वस्त्र और छोटे-छोटे आभूषणों में सजे। सब उन्हें देखकर बोले, “हमारे नन्हे कान्हा कितने प्यारे लग रहे हैं!”
नन्द बाबा ने ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र, मालाएँ और गौएँ भेंट कीं। ब्राह्मणों और गोपियों ने कान्हा को प्रेम से आशीर्वाद दिया।
आँगन के एक कोने में सामान से भरा एक भारी शकट खड़ा था। शकट, यानी सामान रखने वाली बैलगाड़ी।
बैलगाड़ी पर दूध-दही के पात्र और धातु के कई बर्तन रखे थे। उत्सव से थके कान्हा की आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं।
धूप तेज़ होने लगी तो यशोदा मैया ने कान्हा के पालने को बैलगाड़ी की ठण्डी छाया में रख दिया। कान्हा को आराम से सुलाकर वह उत्सव में आए ब्रजवासियों का स्वागत करने चली गईं।
उसी समय हवा का एक अनजाना झोंका नन्द भवन में घुस आया। पेड़ों के पत्ते काँपे और रंगोली पर रखी फूलों की पंखुड़ियाँ उड़ने लगीं।
सोते हुए कान्हा ने धीरे से आँखें खोलीं और हवा की ओर देखा। उनके होंठों पर हल्की मुस्कान आई, मानो वे समझ गए हों—“अच्छा, तुम आ गए!”
अदृश्य शकटासुर कान्हा की रहस्यमयी मुस्कान का अर्थ नहीं समझ पाया। वह चुपचाप भारी बैलगाड़ी के भीतर जा छिपा।
“अब यह बैलगाड़ी उस बालक पर गिर जाएगी,” उसने घमण्ड से सोचा। वह अपनी हवा जैसी शक्ति से बैलगाड़ी को नीचे की ओर दबाने लगा।
भूखे कान्हा मैया के दूध के लिए रोने लगे, पर उनकी चमकती आँखें बैलगाड़ी की ओर उठ गईं। मानो नन्हे श्रीहरि मन-ही-मन सोच रहे हों—“मैया नहीं सुन रहीं? तो आज कुछ बड़ा करना पड़ेगा!”
यशोदा मैया उत्सव में आए अतिथियों की सेवा में व्यस्त थीं। मंगलगीत और वाद्यों के बीच कान्हा की पुकार उन तक नहीं पहुँच सकी।
शकटासुर अब बैलगाड़ी को नन्हे कान्हा के ऊपर गिराने लगा। पर उसे क्या पता था—जिस श्रीहरि के चरण-स्पर्श का वरदान उसे बहुत पहले मिला था, वही कोमल चरण अब उसकी ओर उठने वाले थे।
फिर कान्हा ने अपने नन्हे पैर हवा में हिलाए, मानो मैया को पुकारने का नया ढंग मिल गया हो। उनका नए पत्ते जैसा कोमल चरण धीरे-धीरे भारी बैलगाड़ी की ओर उठने लगा।
कान्हा का नन्हा चरण बैलगाड़ी को हल्के से छू गया। बैलगाड़ी पलट गई; पहिए निकल गए और बर्तन “धड़ाम-धड़ाम” गिरने लगे।
टूटी बैलगाड़ी से अचानक सुनहरी रोशनी निकली और शकटासुर का डरावना रूप मिट गया। उस प्रकाश में देवता जैसा एक दिव्य जीव प्रकट हुआ—“मैं मुक्त हो गया!”
उसने नन्हे कान्हा के भीतर क्षणभर शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किए श्रीहरि का चतुर्भुज रूप देखा। वह हाथ जोड़कर झुक गया—“प्रभु, मैं आपको हानि पहुँचाने आया था, फिर भी आपने मुझे मुक्त कर दिया!”
शकटासुर ने नन्हे श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और सौ घोड़ों वाले दिव्य रथ पर बैठकर गोलोक धाम की ओर चला गया—वह दिव्य लोक, जहाँ राधा-कृष्ण सदा विराजते हैं। कान्हा को हानि पहुँचाने आया शकटासुर, उनके कोमल चरण-स्पर्श से सदा के लिए मुक्त हो गया।
भयंकर आवाज़ सुनते ही यशोदा मैया, नन्द बाबा और सभी ब्रजवासी दौड़कर आँगन में आए। टूटी हुई बैलगाड़ी के बीच कान्हा को सुरक्षित देखकर सब आश्चर्य में पड़ गए।
यशोदा मैया ने दौड़कर कान्हा को अपनी गोद में उठा लिया और प्रेम से हृदय से लगा लिया। कान्हा मैया की बाँहों में मुस्कुरा रहे थे, मानो कुछ हुआ ही न हो।